हेमंत सरकार की "आर्थिक कलाकारी"

झारखंड सरकार ने मैया सम्मान योजना जैसे योजनाओं से जनता को राहत देने का वादा किया है, लेकिन इस वादे की हकीकत तब सामने आती है जब खजाने को भरने के लिए खदानों की नीलामी पर पूरी तरह निर्भर होना पड़ रहा है। सरकार की आर्थिक नीति ऐसी दिखती है जैसे घर में त्योहार मनाने के लिए बर्तन गिरवी रख दिए जाएं।

राजस्व बढ़ाने या पस्त करने का खेल?

खनिज संपदा से संपन्न झारखंड के लिए खदानों की नीलामी कोई नई बात नहीं है। पर हर बार खजाने का घाटा पूरा करने के लिए यही "अलादीन का चिराग" घिसना सरकार की सीमित सोच और लचर नीति का प्रतीक है। आखिर कब तक सरकार अपनी योजनाओं के खर्च को खनिज संपदा की बलि देकर चलाएगी? और अगर खदानें खत्म हो गईं तो फिर कौन सी योजना शुरू होगी?


स्थायी समाधान नहीं, अस्थायी मरहम

सरकार का यह कदम उस किसान जैसा है जो अपने खेत बेचकर कर्ज चुकाता है, लेकिन अगले साल फसल बोने के लिए जमीन नहीं बचती। खदानों की नीलामी से राजस्व जरूर मिलेगा, पर यह पैसा खर्च होते देर नहीं लगेगी। सवाल यह है कि जब इस अस्थायी आय का भी अंत हो जाएगा, तब सरकार कौन सा जादू दिखाएगी?

योजनाएं या चुनावी झुनझुना?

मैया सम्मान योजना जैसी योजनाओं का असल उद्देश्य जनता को लाभ पहुंचाना है या अगला चुनाव जीतना, यह तो सरकार ही जाने। लेकिन जो सरकार अपने खर्चों को पूरा करने के लिए लगातार प्राकृतिक संसाधनों को बेच रही हो, उसकी प्राथमिकताएं जनता को समझने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

निष्कर्ष: दूरदृष्टि की कमी

झारखंड सरकार की यह "नीलामी नीति" दूरदृष्टि के अभाव और आर्थिक अस्थिरता का संकेत है। खनिज संसाधनों को बेचकर राजस्व जुटाना कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी कमजोरी को छिपाने का प्रयास है। बेहतर होता अगर सरकार अपनी योजनाओं के लिए स्थायी और टिकाऊ वित्तीय प्रबंधन की नीति अपनाती, बजाय इसके कि हर बार "नीलामी का ढोल" पीटकर जनता को दिखावा करती।

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